चुनाव से पहले कर रहे थे अखिलेश का समर्थन लेकिन चुनाव के दिन राजा भैया ने बोल दी ऐसी बात कि…

जैसा कि आप लोग जानते हैं कि राजनीति में ना कोई स्थायी दोस्त होता है और ना ही कोई स्थायी दुश्मन. ऐसे में राजनीति में मापदंड बदलते रहते हैं. अब उत्तर प्रदेश की राजनीति को ही ले लीजिये जो सपा, बसपा एक दूसरे की विरोधी पार्टियां थीं वो भी आज एक हो गई हैं और यूपी में 10 राज्यसभा सीटों के लिए जो मतदान हो रहे हैं उसमें जीत के लिए हर संभव कोशिश कर रही हैं. खैर सपा के पास 47 विधायक हैं तो वो आसानी से अपनी उम्मीदवार जया बच्चन को राज्यसभा भेज सकती है लेकिन अखिलेश यादव को मायावती से अपनी दोस्ती भी निभानी है तो उसके उम्मीदवार को राज्यसभा भेजने के लिए वो परेशान हैं.

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बसपा के उम्मीदवार को राज्यसभा पहुंचाने के लिए 35 विधायकों का जुगाड़ तो हो चुका है क्योंकि कांग्रेस ने भी बसपा विधायक को समर्थन दे दिया है. अब जीत के लिए दो विधायकों की जरूरत और है. ऐसे में कुंडा से निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के मतदान में हिस्सा लेने को लेकर सस्पेंस बना हुआ है. आपको बता दें कि राजा भैया को मुलायम सिंह का काफी करीबी माना जाता है और अखिलेश से भी राजा भैया के अच्छे संबंध हैं. इसके अलावा उनके साथ बाबागंज के निर्दलीय विधायक विनोद सरोज को भी वोट करना है. अब पेंच ये फंसा हुआ है कि मायावती और राजा भैया के बीच छत्तीस का आंकड़ा है. बसपा सरकार के दौरान राजा भैया को लोहे के चने चबाने पड़े थे. वहीं सपा की डिनर पार्टी में राजा भैया ने ऐलान किया था कि वह अखिलेश के साथ रहे थे, रहे हैं और आगे भी रहेंगे. राजनीतिक विश्लेषक कह रहे हैं कि राजा भैया बसपा के विधायक को वोट देंगे लेकिन चुनाव के दिन उन्होंने जो ट्वीट किया वो चौंकाने वाला है.

न्यूज 18 की खबर के अनुसार, ट्वीट करके राजा भैया ने साफ़ दर्शा दिया है कि, वो अखिलेश के साथ है इसका ये मतलब बिलकुल नहीं निकाला जाना चाहिए कि वो बसपा के साथ हैं. उनकी इस बात का अर्थ यह निकाला जा रहा है कि वो मायावती सरकार में उनके साथ हुए व्यवहार को भूले नहीं हैं और राज्यसभा चुनाव में वो इसका हिसाब पूरा कर सकते हैं.

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कयास ये भी लगाए जा रहे हैं कि पहली वरीयता में राजा भैया का वोट सपा को जाएगा, लेकिन दूसरी वरीयता में उनका वोट बसपा उम्मीदवार को न जाकर बीजेपी को जा सकता है, इससे बीजेपी फायदे में आ जाएगी. अगर राजा भैया का वोट सपा समर्थित बसपा उम्मीदवार भीमराव अम्बेडकर को जाता है तो इससे सिद्ध हो जाएगा कि राजनीति में दोस्ती और दुश्मनी वक्त के साथ बदलती रहती है.